एक बड़ा और खतरनाक बाघ धीरे-धीरे सार्वी की तरफ़ बढ़ रहा था। लेकिन सार्वी को इसका कोई अंदाज़ा नहीं था। जब बाघ ने सार्वी को देखा, जो भूखी होने के बावजूद चुपचाप बैठी थी और अब भी उसमें जान बाकी थी, तो बाघ की आँखों में नरमी आ गई।
उसने सार्वी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया, बल्कि धीरे से अपना सिर उसके पास ले जाकर उसे प्यार से सहलाया। फिर बाघ उसके पास लेट गया ताकि सार्वी उसकी पीठ पर बैठकर खेल सके। शाम तक बाघ ने सार्वी को अपनी पीठ पर बिठाया और अपने घर — एक गुफा — ले गया। अब वह सार्वी को अपने बच्चे जैसा मानने लगा था।
गुफा में बाघ लगातार उसका ध्यान रखता, जैसे वह चाहता हो कि उसे कोई चोट ना लगे। रात को वह अपने गर्म शरीर को तकिए की तरह बना देता, ताकि सार्वी आराम से सो सके। जब सार्वी गहरी नींद में होती, तो बाघ चुपचाप खाना ढूँढने बाहर चला जाता।
एक रात जब बाघ बाहर गया, तो उसने पहाड़ के नीचे इंसानों की रोशनी देखी। उस पल उसे कुछ महसूस हुआ — शायद याद आया कि सार्वी इंसानों की दुनिया से है।
कुछ दिन बाद सार्वी ज़मीन पर खेल रही थी और बाघ उसे दूर से देख रहा था। अचानक उसका खिलौना पहाड़ी से नीचे गिर गया और सार्वी उसके पीछे दौड़ पड़ी। वह गिरने ही वाली थी कि बाघ समय पर पहुंच गया और उसे बचा लिया।
उसी समय एक कुत्ता उस खिलौने की खुशबू सूंघते हुए वहाँ तक पहुँच गया। वह कुत्ता सार्वी का पुराना दोस्त था। उसने उसे पहचान लिया। सार्वी ने अपना खिलौना देखा और खुश होकर उसे गले लगा लिया। अब कुत्ता भी उसके पास रहने लगा और उसकी रक्षा करने लगा।
तभी बाघ ने पहाड़ के ऊपर से ये सब देखा। कुत्ता उसे देखकर डरा नहीं। दोनों ने एक-दूसरे को शांति से देखा। बाघ ने सार्वी को देखा — वह बहुत खुश लग रही थी। बाघ समझ गया कि सार्वी अब सुरक्षित और खुश है।
उसने अपने नुकीले दांत पीछे कर लिए। जब सार्वी और उसका कुत्ता पहाड़ से नीचे जाने लगे, तो बाघ ने एक कदम आगे बढ़ाया... लेकिन फिर रुक गया। फिर वह मुड़ा और पहाड़ की चोटी की तरफ़ चला गया। चुपचाप खड़ा रहा और सार्वी को जाते हुए देखता रहा, क्योंकि अब उसे समझ आ गया था — सार्वी की असली जगह यहाँ नहीं, बल्कि अपने लोगों के बीच थी।
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